Wednesday, April 30, 2008

bastar samachar: जङ से उजाङे जा रहे जंगल

bastar samachar: जङ से उजाङे जा रहे जंगल

जङ से उजाङे जा रहे जंगल





उपरोक्त सभी चित्र बस्तर के जंगल की दुर्दशा की कहानी बयान कर रही है | यह कहानी घट रही है, कोंडागांव से नारायणपुर होते हुये राजनांदगांव तक जारी सङक चौङी करण के कथित विकास कार्यक्रम के दौरान | सागौन,साल,हरे-भरे व फल लगे आम सहित हजारों इमारती और फलदार बृक्षों की बलि क्या विकास की अनिवार्य परिणिति है ? इन पेङों की कीमत केवल कुछ अरब नही, उससे कंही बढ कर है |

Tuesday, April 22, 2008

निष्पक्षता के भ्रमात्मक आवरण के खिलाफ

जी हां!हम पूरे दावे के साथ स्वीकार करते हैं कि हम निष्पक्ष नही हैं | बल्कि यह कहें कि इस ब्लग की जरूरत भारतीय पत्रकारिता में अचानक घुस आये छद्म निष्पक्षता के नाम पर संवेदन शुन्यता के कारण ही पङा है | पत्रकार मूक-दर्शक बनकर अपने आस-पासघट रहे,समाज और देश को पीछे की ओर ले जाने वाली घटनाओं और शोषण चक्र को केवल परोसने के काम में लगे हुये हैं |

पत्रकारों के लिये किसी कन्या के साथ होने वाला बलात्कार, और किसी आदमी को जलते हुये देखना केवल समाचार बनकर रह गया है | यह पत्रकारिता की चारित्रिक विभीत्सता को प्रदर्शित नही करता तो और क्या है ? आप एक जलते हुये आदमी को केवल इसलिये बचाने की कोशिश नही करते कि उसकी मौत को आकर्षक खबर का सामान बनाकर क्रय-विक्रय के लिये सूचना बाजार में बेच सके !

बहुत दिन हुये छत्तीसगढ के कांकेर में एक अवैध व निर्मम प्रशासनिक कार्यवाही का बिरोध करते हुये मैने एक आई ए एस अफसर का गुस्सा झेला था,तब एक प्रतिष्ठित दैनिक के संपादक ने मुझे सलाह दी थी कि पत्रकार का काम केवल घटनाओं को प्रत्यक्षदर्शी रहकर देखना और पाठक के सामने परोसना है |

आज गंभीरता से विचार करें तो समझ आयेगा कि कई खुबियों के बावजूद पत्रकारिता अपने दायित्वबोध से भटक चुका है | लेकिन संवेदनहीनता का सारा दोष पत्रकारों के सर पर मढना ठीक नही होगा | सच तो यह है कि उपभोक्ता-वादी बाजार ब्यवस्था ने मानव गरिमा और संस्कृति के सारे मुल्य मिटा देने का अभियान चला रखा है , यह सब उसी की परिणति है | उत्तरदायित्य विहीन व इंसानियत बिरोधी पत्रकारिता ने पैर पसार लिया है,जंहा दिखावा ,सत्ता-पक्ष और माफिया की चाटुकारिता और चटकारा युक्त प्रस्तुति के अलावा और कुछ नही |जनता के हित में अपनी सामाजिक भूमिका का निर्वाह न कर पाने की अपनी मजबूरी और नपुंसकता को छिपाने के लिये ही निष्पक्षता के अपने भ्रमात्मक दायित्व का सृजन कर लिया गया है |

सच्चाई यह है कि भारतीय पत्रकारिता का इतिहास कभी भी निष्पक्ष नही रहा है |बल्कि पूर्ण संवेदनशीलता की प्रवित्ति के साथ एक हांथ में झंडा और दुसरे हांथ में कलम थामे भारतीय पत्रकारिता की शुरुवात हुई है |झंडे पर हांथ की पकङ कलम की अपेक्षा ज्यादा मजबूती से दिखाई देता है |साफ शब्दों में कहें कि पत्रकार अपने दायित्व का निर्वहन करने वाला नागरिक पहले होता है,पत्रकार बाद में |

े सुप्रीम कोर्ट में दाखिल शपथपत्र के आंकङे


नक्सलियों ने सन् 2007 के दौरान 635 हमले किये हैं जिनमें 242 नागरिकों और 125 सुरक्षा बल के जवानों की मौत हुई है. उन्होंने स्कूल, पुलिस चौकियों, पंचायत भवन, रेलवे सम्पत्ति, बिजली टावर, खदान आदि ढहाए हैं. कहा गया है कि इस एक साल में नक्सलियों ने 55 प्राथमिक स्कूल भवन, 8 पंचायत भवन, 9 शाला आश्रम, 9 हास्टल, 8 आंगनबाड़ी केन्द्र और 18 अन्य भवनों को नष्ट किया है. इनके भय से बस्तर के भयभीत ग्रामीणों ने राहत शिविरों में शरण ले रखी है और इन शिविरों में भी नक्सली हमला करने से बाज नहीं आ रहे हैं. इन परिस्थितियों में नक्सलियों के खिलाफ जनता की ओर से खड़ा किया गया सलवा जुड़ूम अभियान जबरिया रोकना सरकार के लिए संभव नहीं है.
शपथ पत्र में कहा गया है कि सरकार ने बस्तर में 3400 विशेष पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति की है, जिसका पुलिस एक्ट में प्रावधान है. ये एसपीओ नक्सलियों के आतंक को रोकने में काफी मददगार साबित हो रहे हैं.असाधारण परिस्थितियों में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जम्मू-कश्मीर की तरह यहां भी एसपीओ कारगर हैं. सरकार ने कहा है कि कहीं-कहीं यह संयोग है कि नक्सलियों के खिलाफ लड़ने वाले एसपीओ में से कुछ सलवा जुड़ूम के सदस्य हैं.

Tuesday, April 15, 2008


बस्तर के अंदुरनी छेत्रों के गाँवो मे ऐसा ही नजारा देखने को मिलेगा यंहा पहले स्कूल लगता था
जुडूम आन्दोलन या आसलवा-तंक ? फैसला आज -
कहाने को तो सलवा-जुडूम एक स्व:-स्फूर्त आन्दोलन है , पर कई मौके पर यह घोषित हो गया है कि यह सरकार प्रायोजित है नक्सली समस्या से ग्रस्त छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा चलाये जा रहे सलवा-जुडूम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट मे दायर याचिका पर आज सुनवाई होगी इस याचिका मे यह सवाल उठाया गया है कि नक्सलियों से मुकाबला के लिए सरकार द्वारा जनता के हाथो हथियार थमाना क्या उचित है ? इस याचिका मे न्यायलय से अपील कि गई है कि सलवा-जुडूम पर प्रतिबंद लगाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार को निर्देश दिया जाए