बुधवार, 27 मई 2015

और अब स्थानीय मिडिया और "बाहरी मिडिया के नाम से सलवा जुडूम "


"कल्लुरियत " के शिकार जवान "
        -साथियों युद्ध का  इतिहास , मानव सभ्यता के शुरुवात से है | हर समय ताकतवरों द्वारा कमजोरों को दबाने के लिए , अपना गुलाम बनाए रखने के लिए , हर प्रकार की सत्ता के लिए  , जमीन के लिए , जंगल के लिए , जल के लिए युद्ध होते रहें हैं | मामा चाहे कंस हो या शकुनि हो याकि कल्लू हो  , हर समय मामा होते आयें हैं | हमारा काम सच्चाई को सामने लाने का है , इसी सच्चाई से ही ईतिहास की सही बुनियाद बनेगी | अब- तक का इतिहास सत्ता पक्ष के चाटुकारों द्वारा बनाया गया है  i भड़वों से इतिहास लिखाने की परम्परा पहले ख़त्म करनी होगी , तब बहुसंख्यक शोषित वर्ग का सम्मान लौटेगा और वह मजबूती  से मुट्ठीभर शोषकों के खिलाफ उठ खड़ा होगा | अब तक हुए युद्धों के इतिहास में इसीलिए कमजोर पक्ष पराजित होते रहा , क्योंकि इतिहास गलत रहा , और बहुसंख्यक कमजोर पक्ष हमेशा इतिहास के  भ्रमजाल में फंसकर आपस में ही उलझते  रहा | सचाई यह भी कि हमेशा जनता को ही जनता के खिलाफ खड़ाकर अब-तक का परिणाम मुट्ठी भर बड़े लोगों के पक्ष  में होते आया |
" कल्लुरियत " के शिकार मासूम
              इन सारी बातों के बाद भी बस्तर के उन कलमकारों को जो सच्चाई उजागर करने के लिए अब भी पूरी निडरता के साथ और अपने बिके हुए संस्थानों के दबाव के बावजूद अपनी जान और रोजी-रोटी की कीमत पर सच्चाई सामने लाने के लिए डटें हुए हैं --  मेरा सलाम !! साथ ही देश और देश से बाहर पूरी दुनिया के पत्रकारों और लेखकों को मै सलाम करता हूँ , जो सचाई जानने और बताने के ईमानदार प्रयास में लगे हुए हैं | उनके इस प्रयास में अप्रत्यक्ष ही सही बस्तर के उन गुमनाम साथियों को भी सलाम जो उनके लिए गाईड और पथ-प्रदर्शक का काम कर रहें हैं और कल्लू मामा के निशाने पर आ गए हैं |मगर इस सच्चाई के साथ कि सच के लिए " भीतर " तो घुसना होगा , केवल बाहर से झांककर सच की गहराई नापी नहीं जा सकती | सच को भीतर से बाहर लाने के प्रयास को रोकने की हर " कल्लुरियत " ( जैसे धोखे के लिए जयचंदी ) कोशिश असफल साबित होगी इस आशा के साथ |

शुक्रवार, 22 मई 2015

हिम्मत और सच से डरता है कल्लूरी


यह है वो रिपोर्ट जिसे लेकर दक्षिण बस्तर के दबंग , निर्भीक और निरपेक्ष पत्रकार प्रभात सिंह दुर्दांत पुलिस अधिकारी के रूप में चर्चित बस्तर आईजी शिव्र राम प्रसाद कल्लूरी के निशाने पर हैं प्रभात सिंह | प्रभात सिंह की रिपोर्टिंग से ही आज बारसूर की एतिहासिक धरोहर आज बचे हुए हैं | विभिन्न विभागों में हुए अरबों के घोटालों को लेकर प्रभात ने वर्षों से पोल खोल अभियान चला रखा है , नक्सलियों की निर्मम हिंसा की ख़बरें भी प्रभात ने निर्भयता से लिखी वहीँ सरकार की नीतियों की वजह से जनता की सुरक्षा की जगह सेठों के लिए जंगल और जमीन खाली करने के काम में बेमन से लगाए केवल नौकरी बचने के लिए हताश जवानों द्वारा कल्लूरी के निर्देशों पर हो रहे फर्जी मुठभेड़ों की ख़बरें भी प्रभात हिम्मत से सामने लाते रहा है | प्रभात की एक अच्छे संवेदन शील , निर्भीक , निष्पक्ष पत्रकार की छवि के लिए मुझे ज्यादा परिचय देने की जरुरत नहीं , यह पूरे प्रदेश ही नहीं देश भर के पत्रकार व बुद्धिजीवी जानते हैं |जिसको ज्यादा जानना है या संदेह है तो उनके वाल में झाँक सकते हैं |
प्रभात सिंह को पिछले दिनों सार्वजानिक रूप से एक पत्रकारवार्ता के दौरान शिव राम प्रसाद कल्लूरी ने धमकाते हुए कहा था कि – “ सारे पत्रकार किसी और रास्ते पर हैं और तुम किसी और रास्ते पर , तुम्हारी पूरी कुंडली मेरे पास है , मै जानता हूँ कि तुम किसके लिए काम करते हो !! मै तुम्हे देख लूँगा “ मै सोचता हूँ कि कल्लूरी ने ऐसा कहकर पूरे बस्तर के पत्रकारों का अपमान किया है | वे जिस चाटुकारिता के रास्ते पर सारे पत्रकारों के चलने की बात कर रहें हैं , मै नही मानता कि इस रास्ते पर अकेले प्रभात को छोड़ कर सभी पत्रकार चल रहें हैं | बहुत सारे और पत्रकार हैं जो कल्लुर्री के सेट किये गए रास्ते में नही बल्कि पत्रकारिता को धर्म मानकर ईमानदारी के रास्ते चल रहें हैं | 
प्रभात सिंह अपने वाल में कह रहें हैं “ कल्लू मामा जिंदाबाद थे जिंदाबाद हैं जिंदाबाद रहेंगे । उनका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता है । सरकार के तरफ से पुलिसिया वर्दी के साथ अंग्रेजों का पुलिस एक्ट भी साथ में हैं । जो फर्जी मामलों में फँसाने में कारगर साबित होता है । कह रहे थे मैं आईपीएस हूँ किताबें पढ़कर आया हूँ । ऐसे ही नहीं नौकरी मिली है । हमारी कुंडली भाजपा के राज में  बांचने की जरुरत क्या ? हम तो खुली किताब है ।
पर कल्लूरी डरता बहुत है प्रभात सिंह के नाम से मैंने उसके चेहरे में अपने नाम का खौफ देखा है । उसकी असलियत बार बार उजागर करूँगा । “ 

मेरी लड़ाई जनता के लिए मगर पुलिस नक्सली समर्थक बताने पर उतारूःसोनी



-आप नेत्री ने पुलिस पर लगाया-आदिवासियों की जमीन हड़पने की हो रही साजिश
दंतेवाड़ा(ब्यूरो) आप नेत्री सोनी सोढ़ी ने पुलिस पर उन्हें मानसिक प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है उनका कहना है कि आदिवासियों पर ज्याददती के खिलाफ वह लड़ रही है, लेकिन पुलिस उन्हें नक्सली समर्थक बताने पर उतारू है ि;/ॅ।;ॅ।आप नेत्री के मुताबिक अगर वह नक्सली समर्थक होती तो उनके पिता नक्सलियों की गोली से जख्मी नहीं होते खेती करने पर नक्सलिय प्रतिबंध क्यों लगाते ?उन्होंने कहा कि बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के नाम पर सरकार द्वारा आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल करने की साजिश रची जा रही है सरकार अगल मसले पर गंभीर होती तो बस्तर में आज परिस्थितियां कुछ और होती समर्पण नीति पर भी आप नेत्री ने सवाल खड़े करते हुए कहा कि हार्डकोर नक्सली कमलेश को छोड़कर इससे पूर्व जितने भी समर्पण हुए हैं वे सभी फर्जी है नक्सली मामलों में गिरफ्तारियों पर भी उन्होंने जमकर निशाना साधा आप नेत्री ने कहा कि पिछले दो माह में न्याय व्यवस्था से नक्सली मामलों में जेलों में निरूद्घ ग्रामीणों को उन्होंने रिहाई दिलाई है ।सोनी ने कहा कि बस्तर में व्याप्त समस्या का हल गोली नहीं है शांति के लिए दो पक्षों में वार्ता एक सशक्त माध्यम है पत्रकारों के सवाल के जबाव में उन्होंने कहा कि अगर बस्तर में शांति बहाली के लिए मध्यस्थता की बात आती है और अन्य जनप्रतिनिधियों के साथ उन्हें भी अवसर दिया जाता है तो वे पीछे नहीं हटेंगी इस दौरान आम आदमी से जुड़े अरविंद कुमार, रोहित आर्य, सुकुलधर नाग, निर्वाण अब्बास, विपिन भारद्वाज, संजय पंत, समीर खान उपस्थित थे दंतेवाड़ा पत्रवार्ता को संबोधित करती आप नेत्रीखखखभ-॥-आप नेत्री ने पुलिस पर लगाया आरोपि;-आदिवासियों की जमीन हड़पने की हो रही साजिश


रविवार, 17 मई 2015

सुख भरे दिन बीते रे भईय्या .... दुःख भरे दिन आयो रे...


|अच्छे दिन की अब उम्मीद कम ही रखिये , राज्य सभा में भी बहुमत आने के बाद पूरा का पूरा संविधान ये लोग बदल देंगे | देश में अब तानाशाही ही रहेगी , कांग्रेस समाप्ति की ओर है | अन्य कोई पार्टी नहीं है जो जनता के लिए लड़ रही हो , सब कुर्सी के लिए किसी भी सौदे में शामिल हो सकते हैं | बामपंथी पार्टियाँ गलती पे गलती कर बस आत्म चिंतन में व्यस्त हैं |


आने वाले दिनों में अगर यह सरकार चुनाव करायेगी भी तो विधायक और सांसद किसी विचारधारा या पार्टी के प्रति समर्पित नहीं बल्कि किसी ना किसी कारपोरेट घराने का दलाल ही बनेगा | देश की जनता को मुर्ख बनाए रखने के लिए पूरे देश की मुख्य धारा की पत्रकारिता इनका दरबारी बन ही गया है | वे मुर्ख अंध भक्त पैदा करते रहेंगे | देश की युव वर्ग को बरगलाए रखने के लिए " जय श्री राम " पाकिस्तान मुर्दाबाद , घर वापसी , चीन के खिलाफ नारा , पाकिस्तान के खिलाफ माहौल में ये उलझाये रखेंगे | उन्हें अपने और देश के भविष्य के बारे में ना सोचने देंगे और ना सवाल पूछने देंगे |

हालाकि अभी भी स्थिति कुछ ऐसी ही है | जल जंगल और जमीन और अपने हक़ के लिए सड़क में शान्ति पूर्ण ढंग से आन्दोलन लग-भग प्रतिबंधित सा ही हो गया है | उन पर लाठियां बरसाई जा रही है | आदिवासी , दलित , गरीब के हक़ की बात करने वाला को नक्सली या आतंकी ठहराया जा रहा हैं | जनता की सुरक्षा के नामपर जनता के पैसे से तैनात जवानों को बड़े सेठों और कार्पोरेट की सुरक्षा में उनके नौकर की तरह ईस्तेमाल कर उनकी जान शतरंज के मोहरे की तरह जनयुद्ध के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है |
तब शायद मै ना रहूँ , आप भी ना रहें पर बहुत भुगतने के बाद जनता ही कुछ करेगी | हथियार बंद क्रांति के अलावा आगे कुछ रास्ता दिखाई नहीं दे रहा | मुझे यह मानने में कोई शर्म और डर नहीं है कि आज जनता की लड़ाई केवल सीपीआई ( माओ वादी ) ही लड़ रही है |इस युद्ध में दोनों ही ओर से निर्दोषों की ह्त्या और प्रताड़ना घोर निंदनीय है , हर मारे जाने वाले ग्रामीण , आदिवासी और जवान सभी गरीब वर्ग के ही हैं | शतरंज की बिसात में ये सभी प्यादे के रूप में मारे जा रहें हैं | वैसे मै किसी भी राजनीतिक पार्टी या संगठन का मेंबर नहीं हूँ , केवल पत्रकारिता ही मेरा धर्म है और निष्पक्ष नहीं बल्कि जनपक्षीय हूँ

मंगलवार, 5 मई 2015

बस्तर संभाग और आदिवासियों के लिए ९ मई का दिन काले अक्षरों में लिखा जाएगा


बस्तर संभाग और आदिवासियों के लिए ९ मई का दिन काले अक्षरों में लिखा जाएगा |इस दिन मोदी विकास के नाम पर फिर भारी संख्या में आदिवासियों के विस्थापन और जल जंगल और पहाड़ बेचने की घोषणा करने वाले हैं | कांग्रेस और भाजपा से जुड़े , और केवल लुटने के लिए बस्तर आये गैर आदिवासी काफी खुश हैं , उनका चौमुखी विकास होने वाला है | पहले ही सलवा जुडूम की आड़ में दो लाख से ज्यादा आदिवासी बस्तर के उन क्षेत्रों से भगाए जा चुके हैं जहाँ एस्सार , टाटा , निको आदि बड़े घरानों के उपक्रम शुरू होने हैं | इसके बाद के कई सालों तक रावघाट सहित उन सभी इलाकों के निर्दोष ग्रामीणों को फर्जी मुठभेड़ , फर्जी गिरफ्तारी और फर्जी आत्मसमर्पण के खेल में फंसाकर शिकार किया जा चुका है | उपर से निर्लज्ज कल्लूरी ने प्रेस वार्ताकर निर्दोष आदिवासियों की मदद कर रहे " जगदलपुर लीगल ग्रुप " को नक्सली सहयोगी बता आदिवासियों को पूरी तरह अनाथ बनाने की कोशिश की है | पिछले दो सालों से जगदलपुर लीगल ग्रुप ने संभाग के विभिन्न न्यायालयों में पुलिस और पूरे प्रदेश सरकार के आदिवासी अत्याचार की पोल खोली है , और सैकड़ों निर्दोष आदिवासियों पर बिना सबूत बनाए गए मामलों की धज्जी उड़ाई है | अब चूँकि मोदी के जाने के बाद बड़े प्रोजेक्ट के लिए बड़ा काम होना है तो सारे आदिवासी नेताओं को डराकर , धमकाकर और प्रलोभन देकर अपने ही आदिवासी भाई बहनों की सामूहिक हत्याकांड की साजिश फिर रची जा रही है | इन्होने इसके पहले पिछले पंद्रह साल के अपने बंदूक और डंडे की नीति से पहले ही नक्सलवाद को पचासों गुना बढ़ा दिया है | देश और जनता की रक्षा के नाम पर सेवा में आये लाखों जवानों को बड़े कारपोरेट घरानों के उपक्रमों और उनकी सुरक्षा में लगा उन्हें जनता के साथ ही युद्ध में उलझा दिया है | अब भी अगर आदिवासी नेता और युवा अपने निहित स्वार्थ में उलझे रहेंगे तो इतिहास उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा | फिर से सलवा जुडूम -२ चलाने की योजना आगे होने वाली प्राकृतिक संपदा की लुट और बस्तर में फिर से आदिवासियों का रक्त बहाने की योजना का हिस्सा है |

सोमवार, 4 मई 2015

रवि श्रीवास्तव हत्याकांड के अपराधी अब और हत्याओं के लिए छुट जायेंगे : पैसाखोर पुलिस और न्यायालय की वजह से



कांकेर पुलिस के साथ ही   न्यायालय  में भी भ्रष्ट्राचार  व्याप्त है | न्यायालय की अवमानना होती हो तो हो ,पर सच यही है कि  इस वजह से अब यहाँ किसी को भी न्याय की उम्मीद नहीं रही | कांकेर के जनप्रिय नेता व नगरपालिका अध्यक्ष रवि श्रीवास्तव   की वर्ष २००४ में गोली मार कर  हत्या कर दी गयी थी | इस मामले में कांकेर के तत्कालीन कांग्रेस और अब भाजपा नेता और सबसे बड़े ठेकेदार गुलाम भाई के पुत्र जावेद खान के खिलाफ पुलिस ने पर्याप्त सबूत और साक्ष्य पेश किये थे | जिसमे भिलाई के एक बड़े शूटर गैंग के सदस्यों को दिये गए सुपारी के  नोटों के नंबर और मोबाईल से हुई बात तक ट्रेस कर लिए गए थे | पर कुछ साल पहले स्थानीय पुलिस थाना के माल खाने से सारा सबूत  और नोट तक गायब हो गए थे , जिससे मामला काफी कमजोर हो गया था | फिर भी जिला एवं सत्र न्यायालय से इन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई थी | सजा होने के बाद इस मामले के मुख्य आरोपी को जितनी बार पेरोल पर छोड़ा गया वह भी एक रिकार्ड है | इन दस सालों  के भीतर मुख्य आरोपी को ५० से अधिक बार पेरोल पर छोड़ा गया | इस तरह उसे आसानी से पेरोल मिलना भी जिला जेलों के अधीक्षकों के अलावा अब तक के सभी डीएम को कटघरे में खड़ा करता हैं जिन्होंने इसकी अनुशंसा की | दूसरी तरफ कर कई जरुरत मंद गरीब बंदी और कैदियों को उनके नजदीकी रिश्तेदारों के अंत्येष्टि संस्कार और वैवाहिक कार्यक्रमों के लिए भी पेरोल नहीं देने के कई मामले हैं |  पता चला है कि अपनी जेल यात्रा के दौरान हर महीने दो महीने में जेल से बाहर आकर उसने दो - दो बच्चे तक पैदा कर डाले | सुनने में आता है कि हत्यारा जावेद का ओहदा जगदलपुरजेल में जेल अधीक्षक से भी ऊपर है | ( गायकवाड जी क्षमा करें , पर सच्चाई  मुझे अच्छी तरह से पता है , मेरे कुछ साथी भी अन्दर - बाहर होते रहते हैं ) मेरे भी कुछ मित्रों ने अपने नजदीकी बंदी के लिए स्पेशल सुविधा की बात की , तब पता चला कि जगदलपुर जेल में मो जावेद का एकतरफा राज चलता है | रवि श्रीवास्तव के तब के नजदीकी साथी भी अब पाला बदल चुके हैं | जिनमे से कई का राजनीतिक अस्तित्व स्व रवि श्रीवास्तव ने बनाया था | कांकेर में तब कांग्रेस को खड़ा करने में इनका बड़ा हाथ रहा है , पर इस पुरे प्रकरण से कांग्रेसियों की चुप्पी बड़ा संदेह उत्पन्न करती है ध्यान रहे कि कांग्रेस के समय भी सबसे बड़े ठेकेदार इन्ही का परिवार था अब भाजपा के समय भी इन्ही का परिवार सबसे बड़ा ठेकेदार है | अब एक तरफ तो इन आरोपियों का जमानत आवेदन सर्वोच्च  न्यायालय में लगा हुआ है | , जिसकी सुनवाई से पहले जगदलपुर  के जिला और सत्र न्यायालय के चोरों ने पता नहीं क्या ले देकर फ़ाइल भी गायब कर दिया है ,| इसका पूरा फायदा  इन अपराधियों को ना केवल जमानत मिलने में बल्कि बाईज्जत बारी होने में भी मिल सकता है | इस तरह अन्य अपराधों के फाईल गायब करवाने का रेट क्या चल रहा है , माननीय न्यायाधीशों ???  अगर यह समाचार सही है तो | ध्यान रहे कि आरोपियों की मांग पर ही इस मामले की सुनवाई जिला सत्र न्यायालय जगदलपुर में हुई थी |
 

शनिवार, 2 मई 2015

पोलावरम बांध के हजारों प्रभावित आदिवासियों की आवाज दबाने में लगी सरकार

             
पोलावरम बांध का विरोध करते  रैली निकालने सुकमा जा रहे कांग्रेसियों को सुरक्षा व विश्रामगृह दिलाने पुलिस व प्रशासन ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। कांग्रेसी विधायकों ने इसे भाजपा सरकार की साजिश करार देते कहा कि कांग्रेसी पोलावरम के हजारों प्रभावित आदिवासियों की आवाज उठाने की कोशिश कर हैं, जिसे सरकार दबाने की कोशिश कर रहे हैं।

     जगदलपुर. पोलावरम बांध का विरोध करते मंगलवार को रैली निकालने सुकमा जा रहे कांग्रेसियों को सुरक्षा व� विश्रामगृह दिलाने पुलिस व प्रशासन ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। इसकी लिखित सूचना कांग्रेसी विधायकों को दे दी गई। कांग्रेसी विधायकों ने इसे भाजपा सरकार की साजिश करार देते कहा कि कांग्रेसी पोलावरम के हजारों प्रभावित आदिवासियों की आवाज उठाने की कोशिश कर हैं, जिसे सरकार दबाने की कोशिश कर रहे हैं।� इसके बावजूद विरोध प्रदर्शन का कार्यक्रम यथावत रखा जाएगा और इस दौरान उनके साथ कोई हादसा होता है तो इसकी पूरी जवाबदारी सरकार की होगी।

                               पोलावरम बांध के विरोध में कोंटा में विरोध प्रदर्शन करने जा रहे कांग्रेस के छह विधायक� सोमवार को कोंटा विधायक कवासी लखमा के नेतृत्व में जगदलपुर पहुंचे थे। यहां पहुंचकर सुरक्षा को लेकर उन्होंने बस्तर आईजी एसआरपी कल्लूरी से मुलाकात की।� इस पर कल्लूरी ने मंगलवार को संभागीय मुख्यालय में होने वाले अधिकारियों की बैठक का हवाला देते सुरक्षा देने से इंकार कर दिया।
इसके बाद सभी विधायक स्थानीय फारेस्ट रेस्ट हाउस पहुंचकर पत्रकार वार्ता ली, जहां� कांग्रेस के छह विधायक कवासी लखमा, दीपक बैज, लखेश्वर बघेल, मनोज मण्डावी, संतराम नेताम व शंकर धुरवा मौजूद थे। इस दौरान कांगे्रसी नेता हेमू उपाध्याय, अनवर खान समेत अन्य कांग्रेसी मौजूद थे।

बीस दिन पहले दी थी सूचना
                        पत्रकारवार्ता में विधायक कवासी लखमा व मनोज मण्डावी ने बताया कि विधायक लखमा व लखेश्वर बघेल ने धरना कार्यक्रम की सूचना करीब बीस दिन पहले ही प्रशासन को दी थी।� सुकमा� एसपी डी श्रवण ने सुरक्षा दिए जाने का आश्वासन दिया था। सत्कार अधिकारी से भी� विधायकों के ठहरने के लिए विश्राम गृह का इंतजाम करने कहा था, जिस पर उन्होंने विश्राम गृह में कमरा दिलाने का आश्वासन भी दिया। इधर अब से चार दिन पहले बस्तर आईजी कल्लूरी से मिलकर धरना व रैली के लिए सुरक्षा की मांग की गई थी, जिसमें उन्होंने सुरक्षा देने की बात कही थी। अब धरने के एक दिन पहले प्रशासन सुरक्षा देने से इंकार कर रहा है।

माओवादियों का शहीदी सप्ताह जारी
                     इधर माओवादियों ने एक मई तक शहीदी सप्ताह को लेकर भी बंद का आहवान किया है। एेसी स्थिति में बांध के प्रभावितों के पक्ष में सुरक्षा के अभाव में कांग्रेसी विधायकों का जाना और सरकार से सुरक्षा को लेकर पुख्ता जवाब नहीं मिलना कठिन परिस्थितियों को जन्म दे रहा है।

                  कार्यक्रम में नहीं करेंगे बदलाव
विधायक दल ने पहले से तय नियत कार्यक्रम में बदलाव नहीं करने की बात कही है। विधायकों ने कहा कि सरकार आदिवासियों की आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है। प्रोटोकॉल में विधायक मुख्य सचिव से भी उपर होते हैं पर सरकार के नुमाइंदे उन्हें सुरक्षा देने से इंकार करते पर्याप्त� सुरक्षा बल नहीं होने को बता  रहे हैं |  ( पत्रिका  से   साभार )

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

मोदेनार का सच : झूठे हैं पुलिसिया बयान


मोदेनार से लौटकर प्रभात सिंह

हाल ही में बिसपुर ग्राम पंचायत से अलग होकर नए बने ग्राम पंचायत तोयनार के आश्रित गाँव मोदेनार में 17 अप्रेल शुक्रवार को हुए कथित मुठभेड़ के बाद तमाम तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म है | डॉक्टर की रिपोर्ट और गोपनीय सैनिक हिड़मो मड़काम के बयान और पुलिसिया कारवाई से कई संदेह पैदा होते हैं | इन्हीं सवालों को जानने पत्रिका की टीम मोदेनार गाँव जान जोखिम में डाल कर पहुँची | ग्राम पंचायत तोयनार के एक ग्रामीण ने हमें एक बार गाँव में जाने से मना किया और बताया की वहाँ तीर धनुष से लैस ग्रामीण हैं | यदि गाँव जाओगे तो लौटकर वापस नहीं आ पाओगे | आपको वहीँ बंधक बनाकर रख लिया जायेगा | फिर भी हम जान जोखिम में डालकर पहाड़ियों से घिरे गाँव मोदेनार पहुँचे | गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ था | हम एक ग्रामीण की मदद से गोपनीय सैनिक हिड़मो मड़काम के भाई पांडू और आयतु के घर पहुँचे जहाँ ग्रामीणों ने जो कुछ बताया उसे सुनकर किसी के भी होश फाख्ता होना स्वाभाविक है |
उपसरपंच था गोपनीय सैनिक हिड़मो मड़काम
ग्रामीणों ने बताया कि गोपनीय सैनिक हिड़मो मड़काम ग्राम पंचायत बिसपुर का उपसरपंच रह चुका है | अपने पद पर रहने के दौरान वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन, इंदिरा आवास योजना जैसे तमाम सरकारी योजनाओं के सारे रूपये हड़प लिए थे | जिसके बाद यह मामला किसी तरह माओवादियों तक पहुँचा जिस पर माओवादियों ने तकरीबन तीन साल पहले हिड़मो मड़काम की जमकर पिटाई भी की थी | यह एक मर्तबा होता तो भी बात अलग होती मगर ग्रामीण बताते हैं कि इसके बाद भी हिड़मो मड़काम लगातार इसी तरह भ्रष्टाचार को अंजाम देता रहा जिस पर माओवादियों ने और भी दो मर्तबा इसकी जमकर पिटाई कर डाली और माओवादियों ने धमकी दी कि दोबारा इस तरह के भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं किये जायेंगे | अगर ऐसा क्रम दोबारा दोहराया जाता है तो ऐसी स्थिति में जनादालत में सज़ा ए मौत दी जाएगी | हिड़मो मड़काम को ग्रामीण भी कुछ माह पहले एक बार तीर धनुष लेकर मारने गये थे | हिड़मो मड़काम पर आरोप था की वह गाँव के लोगों को पुलिस में नाम देकर फँसाता है | किन्तु उसकी किस्मत अच्छी थी की वह उस समय घर में मौजूद नहीं था |
गाँव का सबसे अमीर किसान हिड़मो मड़काम
ग्रामीणों के बयानों पर गौर करें तो हिड़मो मड़काम इस इलाके का सबसे धनाढ्य किसान के रूप में जाना जाने लगा जबकि इसकी अमीरी की वजह उपसरपंच पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार की काली कमाई है | हिड़मो मड़काम के पास दो बड़े कच्चे मकान हैं जिसमे तहखाने जैसे कई कमरे भी बने हुए हैं जिनमे हिड़मो मड़काम अपने ऐशो आराम की सामग्रियां रखता था | हिड़मो मड़काम के पास ट्रैक्टर, स्कार्पिओ और दुपहिया वाहन भी हैं | जिन्हें उसने उपसरपंच पद पर रहने के दौरान खरीदे थे |
तीन बीवियों का पति हिड़मो मड़काम
ग्रामीणों के मुताबिक़ हिड़मो मड़काम की मनमौजी प्रवृत्ति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसने एक पत्नी के जिंदा रहते दो और शादियाँ रचायीं थीं जिसके बाद हिड़मो मड़काम की पहली पत्नी ने बेहद मानसिक तनाव से गुजरते हुए आत्महत्या कर ली मगर यह बात पुलिस तक पहुँचने के पहले ही हिड़मो मड़काम ने मामले को गाँव के अन्दर ही दबा दिया |

आईसीडीएस का कालातीत हो गया पूरक पोषण आहार
डिस्क में सहेजा जा रहा है - यहां ले जाएं:




हिड़मो मड़काम के मुख्यमार्ग में उसकी तीसरी पत्नी रहती है | जो आंगनबाड़ी कार्यकर्ता है | हिड़मो मड़काम के दोनों घर तोयनार और मोदेनार स्थित घर में महिला एवं बाल विकास विभाग का पूरक पोषण आहार ऐसे ही कालातीत अवस्था में पड़े हुए हैं | छत्तीसगढ़ शासन की दवाईयाँ भी खाली पड़े मकान में बोरियों में रखी हुई है | जो अब कालातीत हो चुकी हैं | जो महिला एवं बाल विकास के विकासों की कहानियों का मूक गवाह हैं | महिला एवं बाल विकास विभाग पर ऐसे भी बस्तर में सवाल उठते रहे हैं |

जमीन हडपने की फिराक में हिड़मो मड़काम
परेशान हो चले ग्रामीणों ने कैमरे के सामने बताया कि हिड़मो मड़काम ने बीते 2 साल से लगभग 15 ग्रामीणों के पैतृक ज़मीन के राजस्व पट्टे अपने पास यह कहकर रख लिए कि उनके लिए इंदिरा आवास की राशि जारी की जायेगी और आज तक मोदेनार के बेबस ग्रामीण अपने पट्टों के लिए दर ब दर भटक रहे हैं मालूम हो कि हिड़मो मड़काम ने पट्टों के साथ ही पट्टाधारियों की पासपोर्ट आकार की तस्वीरें ले रखी हैं और अब तलक न तो पट्टाधारियों के पट्टे ही वापस लौटाए गए और न ही इंदिरा आवास ही बने गाँव में आज भी घास फूस की झोपड़ियां ही नज़र आती है और खेतों की ज़मीन भी ऊबड़ खाबड़ ही है जबकि हिड़मो मड़काम का दावा है इसने गाँव में काफी विकास कार्य किये हैं | इसके साथ ही पुलिस की जांच के लिए जो सबसे बड़ा और अहम् सवाल छूट जाता है वो ये कि हिड़मो मड़काम कहता है वह 40 एकड़ ज़मीन का इकलौता मालिक है जबकि ग्रामीणों का बयान उसके इस दावे को धता साबित करते हुए हिड़मो मड़काम को महज 5 एकड़ ज़मीन का भूस्वामी बताता है |
नक्सलियों ने नहीं निकाली किसी की आँखें
बीते 17 अप्रैल को दरभा क्षेत्र के मोदेनार में हुई कथित पुलिस नक्सली मुठभेड़ के बाद हिड़मो मड़काम गोपनीय सैनिक का बयान आया था कि नक्सलियों ने उसके भाई आयतु की दोनों आँखें फोड़ डाली हैं जबकि सच इसके ठीक विपरीत है और पत्रिका ने इसकी पड़ताल करते हुए आयतु से मुलाकात कर ली जिसके बाद आयतु को हिड़मो मड़काम के बयान के बाबत बताये जाने पर आयतु ने आँखों में आंसू लेकर पत्रिका को बयान दिया है जो पुलिस और हिड़मो मड़काम के बयान पर एक साथ कई सवाल खड़े करता है | आयतु ने पत्रिका को बताया कि उसे मुठभेड़ के बाद मंगू उर्फ़ महंगू उर्फ़ रासा और उसके साथी जान से मारने के लिए उसे पकड़कर नाले के पास ले गए | उसे पुलिस द्वारा नक्सली सहयोगी बताकर महंगू को फँसाने और हिड़मो मड़काम का भाई होने की वजह से महंगू और उसके साथी पकड़कर ले गए थे | उनके पास कोई हथियार नहीं था जिसकी वजह से केवल उसे डंडों से पिटाई की गई | जिसमें उसके आँख के पास चोंट आई और उसकी एक आँख की पलक पलट गई थी | जहाँ से वह किसी तरह जान बचाकर पहाड़ी में भाग गया और रात जंगल में बिताकर अल सुबह घर लौटा | उसने आगे बताया कि सिर्फ हिड़मो मड़काम के द्वारा पुलिस को गुमराह करने की वजह से आज अपनी ज़िन्दगी बचाने के लिए अपना गृहग्राम और खुद का घर छोड़कर जंगलों में छिपता भटक रहा है |
पांडू नहीं है माओवादियों के कब्जे में
पांडू मड़काम अपने घर में

पांडू और आयतु के नाम पर हल्ला मचा हुआ है कि ये दोनों नक्सलियों के कब्जे में हैं जबकि आयतु से मुलाक़ात के बाद पांडू की पतासाजी में पत्रिका ने पांडू को उसके गृहग्राम मोदेनार में ही सुरक्षित अपने ही घर पर पाया है और पांडू को जब उनके अपहरण के बाबत पूछा गया तो पांडू ने अचंभित होते हुए पत्रिका को बताया है कि उसे किसी से कोई खतरा नहीं है और हिड़मो मड़काम उसके अपहरण की झूठी अफवाह उड़ा रहा है जबकि माओवादियों ने उसे कभी परेशान नहीं किया है | ऐसे में बड़े सवाल पुलिस के बयानों को खंडित भी करते हैं और साथ ही हिड़मो मड़काम की हकीकत को जगजाहिर करते हैं मगर अब सवाल यह उठते हैं कि क्या पुलिस ने अब तलक जितने बयान जारी किये हैं वे सभी कोरी बकवास हैं या फिर हिड़मो मड़काम पुलिस का कोई मोहरा है जिसे पुलिस अपने इशारों पर नचा रही है ? साथ ही हिड़मो मड़काम की हकीकत ग्रामीणों के बयान पर किसी बड़े चालबाज़ से कम भी नहीं लगते | ये तो जांच के बाद ही पता चलेगा कि सच क्या है जबकि अब तलक नक्सल मामलों को लेकर जितने भी जांच चले हैं उन सबके नतीजे आज तक अधर में ही अटके हुए हैं |
गोपनीय सैनिक के भाई के पुलिस पर सनसनीखेज आरोप
पांडू पुलिस पर उल्टे आरोप लगाते हुए कहता है कि मुझे दो बार पुलिस गिरफ्तार कर कटेकल्याण और पखनार थाने ले गई | कटेकल्याण थाने में गिरफ्तारी के समय मेरे साथ 2 अन्य बुधु और बुधराम को भी पुलिस ने फर्जी केस में गिरफ्तार किया था | मेरे उपर टीन तस्करी का मामला बनाया गया | बाद में मेरे चाचा से 5000 लेने के बाद रिहा किया गया | दुसरे बार हिड़मो मड़काम के घर से पांडू को फिर पखनार पुलिस अक्टूबर 2014 में फर्जी नक्सल मामले में गिरफ्तार कर ले गई थी | उस वक्त हिड़मो तोयनार गया था | गिरफ्तारी के बाद पहली बार उसे उसकी माँ 2-4 लोगों के साथ छुड़ाने गई थी, किन्तु उसे छोड़ा नहीं गया | दुसरे दिन जब हिड़मो मड़काम और पांडू के पिता उसे छुड़ाने गए तो उसे 6 हजार रुपये लेकर छोड़ा गया | जिसमें से 5 हजार रुपये खुद हिड़मो ने दिया था |
मुठभेड़, मुठभेड़ ही थी या कुछ और है मामला...
ग्रामीणों के अनुसार 17 अप्रैल 2015 को हिड़मो मड़काम अपने चार साथियों के साथ अंग्रेजी शराब लेकर मोदेनार पहुंचा जहाँ छन्नू मडकाम से हिड़मो मड़काम ने तीन सौ रूपये देकर एक देसी मुर्गा खरीदा जिसे पकाकर इन पाँचों ने शराब पी | गाँव में उस रात बीज पंडूम मनाने के कुछ समय बाद पुलिस गाँव में घुसी | पुलिस ने गाँव के मंगू उर्फ़ रासा मड़काम को हिरासत में लेने की कोशिश की मगर मंगू ने मौका पाकर खुद को एक घर में छिपा लिया जिसके बाद पुलिस ने घर के अन्दर घुसकर मंगू को पकड़ने की कोशिश की जहाँ दोनों पक्षों के बीच हाथापाई भी हुई इस हाथापाई के बीच मंगू किसी तरह पुलिस को चकमा देकर भागने में कामयाब हो गया मगर पुलिस ने मंगू पर रात के घने अँधेरे में गोली दाग दी |
पांडू अपने पिता भीमा के साथ पैतृक मकान में
पुलिस की चलाई गोली भी मंगू को छू नहीं पाई वरन एक ग्रामीण भीमा के पैर में पुलिस की तीन गोलियां जा लगीं जिसका इलाज आप कार्यकर्ता सोनी सोढ़ी ने पखनार गाँव में करवाने की प्रारंभिक कोशिश की और इलाके के सभी ग्रामीणों के साथ पखनार थाने पहुंचकर विरोध प्रदर्शन भी किया था | इसके बाद पुलिस ने आनन फानन में घायल भीमा को गिरफ्तार कर मीडिया में बयान जरी किया कि मोदेनार में पुलिस नक्सली मुठभेड़ के दौरान पुलिस एक नक्सली को घायलावस्था में गिरफ्तार किया है जिसका इलाज जगदलपुर के मेकॉज में किया जा रहा है जबकि पुलिस के बयान को भी मोदेनार इलाके के सभी ग्रामीण एक स्वर में खंडित करते हैं |
हिड़मो मड़काम ले गया अपना सामान
ग्रामीणों के मुताबिक पुलिस द्वारा भीमा को बेवजह गोली मारे जाने के बाद गुस्साये ग्रामीण हिड़मो मड़काम के घर के दरवाजे को तोड़कर घर का सामान तितर बितर कई दिये | जबकि हिड़मो मड़काम ने यह खबर फैलाई की उसके मकान को नक्सलियों ने तोड़ दिया है | घटना के दुसरे दिन 18 अप्रेल को हिड़मो मड़काम पुलिस के साथ ट्रेक्टर लाकर अपने दोनों मकान से आलमारी समेत सारा सामान ले गया | ग्रामीणों के मुताबिक जो ट्रेक्टर हिड़मो मड़काम के पास है | वह भी गाँव की समिति के नाम पर है | जिसे उसने कब्जे में रख-रखा है |

पुलिस ने किया चार को गिरफ्तार
ग्रामीणों के अनुसार पुलिस ने कथित मुठभेड़ के एक दिन बाद 19 अप्रेल रविवार को दिन में चार लोगों की गिरफ्तार कर ले गई है | एक सादे कागज़ पर पुलिस ने लिखकर ग्रामीणों के अंगूठा लगवा लिए कागज़ में एक हस्ताक्षर सरपंच पुत्र के भी हैं | पुलिस ने ग्रामीणों को नक्सली मामले में गिरफ्तार किया जाना बताया है | पर किस नक्सली मामले में इसकी जानकारी नहीं दी जबकि मोदेनार के ग्रामीणों के अनुसार वे सभी गाँव के किसान है | उनका नक्सलियों से कोई लेना देना नहीं है |

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

स्वास्थ्य विभाग में एक और घोटाला ?

संदेह के दायरे में डिपार्टमेंट आफ आयुष , माँग के अनुरूप नहीं, मनमानी दवा खरीदी

 स्वास्थ्य विभाग में विभाग में सत्ता के कर्णधारों व दलालों और सप्लायरों की सांठ-गाँठ   का एक और मामला सामने आया है  अब अपने संदेहास्पद रवैये से छत्तीसगढ़ का डिपार्टमेंट ऑफ़ आयुष शक के दायरे में हैं | इस विभाग में अब-तक दवा सप्लाई का कोई ठोस तकनीकी आधार अभी तक नहीं बनाया गया । माँग के अनुरूप कभी भी दवा सप्लाई नहीं की जाती । मनमानी मात्रा में दवाओं की सप्लाई की जाती है जैसे टैब. सिस्टोन एवं सीरप फ़ीवरेंड बेशुमार मात्रा में सप्लाई किया गया । विभागीय सूत्रों के अनुसार कुछ ऐसी दवायें भी सप्लाई होती हैं जिनकी समापन तिथि सप्लाई के बाद कुछ ही महीने में होने वाली है । सबस्टैण्डर्ड दवाइयाँ बारम्बार ख़रीदी जाती हैं । प्रायः ऐसी फार्मेसियों की दवाइयाँ खरीदी जाती हैं जो ओपेन मार्केट में प्रचलित नहीं , रेपुटेड नहीं हैं और जिनका काम केवल केवल घटिया दवाइयाँ ही तैयार करना है ।
                    भूमकाल समाचार को जानकारी मिली है कि डिपार्टमेंट ऑफ़ आयुष, .. में सरकारी दवा खरीदी में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि मंत्रियों के रिश्तेदारों या मित्रों के मालिकाना हक़ वाली फ़ार्मेसी से दवा खरीदी जाय या फिर ऐसी फार्मेसी से जो बेशुमार कमीशन दे सके छत्तीसगढ़बनने के बाद दवाओं की सैम्प्लिंग के नियम और की गयी जाँच के नतीजों पर की गयी कार्यवाहियाँ आश्चर्यजनक हैं । इसी विभाग के कुछ विशेषग्ज्ञों से यह भी पता चला है कि .. बनने के बाद सप्लाई की गयी सरकारी दवाइयों के स्तर और गुणवत्ता में भारी गिरावट आयी है ।
प्राप्त जानकारी के अनुसार दवाओं की गुणवत्ता की जाँच के लिये आयुष ड्रग कंट्रोलर के निर्देशानुसार आयुर्वेद और यूनानी की केवल शास्त्रोक्त दवाओं की सैम्प्लिंग की जाती है, प्रॉप्रीटरी दवाओं की नहीं, जबकि प्रॉप्रीटरी(ब्राण्डेड) दवाइयों में ही मिलावट और घटिया स्तर होने की अधिक सम्भावनायें हैं । बताया गया है कि ब्राण्डेड दवाओं की जाँच का अभी तक कोई वैज्ञानिक पैमाना विकसित नहीं हुआ है । यदि ऐसा है तो फिर ब्राण्डेड दवायें सरकारी स्तर पर ख़रीदी ही क्यों जाती हैं ?

डिपार्टमेंट आफ आयुष में निर्देशक स्थायी पट्टेदार

 छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से प्रदेश में कई सरकारें बदल गयी | मुख्यमंत्री बदले , मंत्री बदले , मंत्रियों का प्रभार बदला , मुख्य सचिव बदले , कई अधिकारी बदल गए  पर डिपार्टमेंट आफ आयुष में भाजपा शासन के तीसरे कार्यकाल में भी डायरेक्टर साहब नही बदले | इस  विभाग में निर्देशक के पद पर दस वर्षों से भी अधिक समय से डा जीएस बदेशा काबिज हैं | नियमों के अनुरूप विभाग प्रमुख या अध्यक्ष को आईएएस होना आवश्यक है , पर छत्तीसगढ़ सरकार का इस अधिकारी विशेष के साथ ऐसा क्या सम्बन्ध है कि इस पद के लायक योग्यता नही होने पर भी इन्हें एक नही तीनों कार्यकाल में बनाए रखा है | जबकि आईएएस नहीं होने के बाद भी इस पद पर अंगद की तरह चिपके इस अधिकारी के बारे अविभाजित मध्यप्रदेश के समय अनियमितता व भ्रष्ट्राचार के मामले पर एक जांच रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से इन्हें किसी प्रशासकीय भूमिका नही देने की अनुसंशा की गयी है |  

अपनों को फायदा दिलाने की नीति

घटिया पायी गयी दवाइयों के उस बैच को तो वापस मंगवा लिया जाता है किंतु उस दवा फ़ार्मेसी को कभी ब्लैक लिस्टेड नहीं किया जाता और अगले वर्ष फिर वही घटिया दवाइयाँ खरीदी जाती हैं । उत्तराखण्ड के मोहान, अल्मोड़ा में केन्द्र सरकार द्वारा स्थापित शासकीय आयुर्वेदिक फार्मेसी है जिसकी दवाइयों की गुणवत्ता अच्छी है, केन्द्र सरकार के निर्देश के बाद भी छ.. में वहाँ की दवाइयाँ प्रायः नहीं खरीदे जातीं या फिर नाममात्र की थोड़ी बहुत दवाइयाँ खरीद ली जाती हैं । प्रायः बिलासपुर, गोआ एवं कर्नाटक की अस्तरीय दबाइयाँ खरीद कर सप्लाई की जा रही हैं । इन दवा कम्पनियों से भाजपा नेताओं की नजदीकियां की खबर तो है ही , इनमे से कुछ कम्पनियों के मालिक तो सीधे सत्ता से जुड़े हैं | 


गुणवत्ता की जाँच की व्यवस्था ही नही

विशेषज्ञों से बात करने पर यह बताया गया है कि यद्यपि आयुर्वेद और यूनानी की ब्राण्डेड दवाइयों के लिये कोई एकीकृत मापदण्ड नहीं है क्योंकि हर कम्पनी अपनी ब्राण्डेड दवा का फ़ार्मूला अपने विशेषज्ञों द्वारा तैयार करवाती है इसलिये उनमें बहुरूपता होना स्वाभाविक है किंतु तकनीकी दृष्टि से यह कहना पूरी तरह गलत है कि इनकी गुणवत्ता की जाँच किया जा सकना सम्भव नहीं है । प्रत्येक ब्राण्डेड दवा के घटक उस दवा की पैकिंग पर लिखे रहते हैं, उनकी मात्रा भी लिखी रहती है, उस दवा की गुणवत्ता की जाँच का यही मापदण्ड है । लैब में यह जाँच की जा सकती है कि किसी दवा की पैकिंग पर लिखे घटक उस दवा में हैं भी या नहीं और हैं तो कितनी मात्रा में हैं ।

शासकीय आयुर्वेदिक फार्मेसी की अनदेखी

इस विभाग में सरकारी ख़रीदी में ब्राण्डेड दवाइयाँ आवश्यक नहीं हैं, आयुर्वेद और यूनानी की शास्त्रोक्त दवाइयाँ ही अपने आप में पर्याप्त हैं । छ.. में शासकीय आयुर्वेदिक फार्मेसी स्थित है जिसमें प्रायवेट कम्पनियों से खरीदी गयीं दवाइयों की अपेक्षा कहीं अधिक उत्तम गुणवत्ता की दवाइयों के निर्माण का इतिहास रहा है । किंतु छ.. अलग होने के बाद से इस फार्मेसी में दवा निर्माण लगभग ठप्प है जबकि पहले इस फार्मेसी से पूरे मध्यप्रदेश को दवा सप्लाई की जाती थी । अब यह फार्मेसी केवल छ.. को ही दवा सप्लाई नहीं कर पाती । जबकि पर्याप्त दवा का निर्माण कर पूरे छ.. को सप्लाई करने की क्षमता इस फार्मेसी में है ।

इन पूरे मामलों को लेकर आयुष विभाग के डाईरेक्टर डा जीएस बदेशा और प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के सचिव से सम्पर्क करने की कोशिश की गयी पर उनके द्वारा फोन नही उठाया गया | 


मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

साथियों की निर्मम हत्या से गुस्साये जवानों के नाम एक पत्र

                                                                                            यह घोर निंदनीय घटना है | मै आपकी भावना समझता हूँ , आपको भी  अब इस तंत्र को समझना होगा |  यह लूट तंत्र अपने फायदे के लिए पुलिस का इस्तेमाल जब  तक उसी जनता के खिलाफ करता रहेगा , जिसने उसे चुनकर भेजा था, तब-तक  इसी तरह जवान मरते रहेंगे | आपको उस शतरंज के  निर्मम खेल को समझना होगा,   जिसके लिए  दांव में गरीबों     जीवन  लगाया   जाता है | मरे  चाहे जवान  या आदिवासी  || इनके लिए यह सब खेल है | यह खेल जल जमीन और जंगल पर कब्जे की लड़ाई के लिए है| जो जीतेंगे ओ मालिक होंगे | जो मरेंगे ओ सभी  प्यादे ही रहेंगे | चाहे आदिवासी हों, चाहे जवान!!!  आपको  जानना होगा कि जिन सेठों को सबकुछ बेचा जा रहा है , आप उनकी सुरक्षा के लिए वेतन लेते हैं कि उनके लिए ( जिसमे आप भी हैं) जिनके हक़ और हिस्से की  जमीन  निहित स्वार्थ के लिए बेची  जा रही है | आपमें से बहुत से ऐसे साथी हैं जिसने यह नौकरी केवल  जीवन  यापन के लिए ज्वाईन किया  है | आप सब गरीब और माध्यम वर्गीय  परिवार से हैं | कई ने  तो इसके लिए लाखों रिश्वत दी है , ताकि आपके परिवार का भरण - पोषण हो सके , ताकि आप अपनी जवाब दारियों का निर्वहन कर सकें | आप भोले हैं , मगर आपका अधिकारी भोला नहीं है , आपका मंत्री भोला नहीं है , आपकी सरकार भोला नही है | ये सब बिके
हुए हैं , ये सब ठेके में हैं , इन्हें किसी निश्चित  समय में  जनता की जमीन खाली कराकर किन्ही सेठ को सौंपनी है | इसी के लिए आप उनकी लाठी बने हुए हैं | इन लाठियों को जो तोड़ रहें हैं वे किसी और सेठ के हांथों बिके हुए हैं | उनकी लाठी या कहें कि कंधा निरीह आदिवासी है | तो फिर आप समझो कि आप देश के लिए शहीद नही हो रहे | कि हर मरने , विस्थापित होने ,गिरफ्तार होने या समर्पण करने वाला नक्सली नहीं | वो सभी भी आपकी ही तरह बस हथियार हैं | आप संगठन बनाओ , लड़ो कि आप हथियार नहीं हो , लड़ो कि आप जनता के पैसे से वेतन लेकर जनता के खिलाफ लड़ने के लिए नहीं हैं , लड़ो कि आप खुद भी इस लूट तंत्र के शिकार हो | जनता के खिलाफ किसी भी तरह की हिंसा का प्रतिकार करो , चाहे हत्या जवानों की हो या निरीह ग्रामीणों की | शतंरज खेलने वालों के खिलाफ तैयार हो |                                                            कमल शुक्ल 

बुधवार, 19 नवंबर 2014

कांकेर के एलियन और इतिहास का नज़रिया



आसमान में बादलों को देख कर विभिन्न तरह की कल्पनायें जन्म लेती हैं। इतने सुन्दर रूप और आकृति रचते हैं रंग-बिरंगे बादल कि कभी कोई चिड़िया बन जाते हैं तो कभी कोई जानवर का मुख नजर आता है, कभी उडनतश्तरी जैसे लगने लगते हैं। बादलों को निहारना आपका सौन्दर्यबोध हो सकता है किंतु उभरी हुई आकृतियों से उपजी कल्पनाओं को सच तो नहीं माना जा सकता? बस्तर के इतिहास को देखने का हमारा नजरिया हमेशा से बादलों को निहारने और कल्पनाओं पर मुंगेरीलाल वाले दावों का रहा है। बस्तर की उपलब्ध ऐतिहासिक और पुरातात्विक सम्पदायें अब तक अबोली-अबूझी हैं। कोई नहीं जानता कि नलों की वास्तविक राजधानी कहाँ थी, उनकी जीवनशैली और शासन-प्रशासन सम्बन्धी कोई ठोस जानकारियाँ उपलब्ध नहीं हैं, नागों के सम्बन्ध में भी यही सच्चाई है। केशकाल के निकट गढधनोरा के टीले अब तक खोदे नहीं गये जहाँ अपेक्षा है कि नलकालीन कुछ साक्ष्य प्राप्त हो सकते हैं। नागों की विरासत बारसूर मे तो जो बाहर-बाहर दिखता है केवल वही और उतना ही इतिहास है। पता नहीं कब गढधनौरा या कि बारसूर के दिन बहुरेंगे और यहाँ विधिवत खुदाई आरम्भ की जायेगी। इसे देखते हुए यह समझना कठिन नहीं कि बस्तर के कोने कोने में स्थित आदिवासी शैल चित्रों का संरक्षण कितनी अच्छी तरह हो रहा होगा तथा उनके दस-पंद्रह हजार साल पहले बनाये चित्रों को कितना बूझा जा सका होगा?
पिछले दिनो संचार माध्यमों ने इस खबर को सनसनी बना कर प्रस्तुत किया कि कांकेर (उत्तर बस्तर) के निकट अवस्थित चंदेली गाँव के पास पहाडों में कुछ शैलचित्र प्राप्त हुए हैं जो पुख्ता प्रमाण हैं कि यहाँ एलियन आया करते थे और उनकी उडनतश्तरी उतरा करती थी। पुरातत्व विभाग के आधिकारियों के हवाले से जोर दे कर यह बात प्रसारित की गयी कि इन शैलचित्रों की आयु लगभग दस हजार वर्ष होनी चाहिये। उस दौरान इन क्षेत्रों में एलियन देखे जाते रहे होंगे तथा वे यहाँ अपनी उडन तश्तरी से उतरा करते थे। जो तर्क रखे गये उसके अनुसार इन शैल चित्रों में हेलिकॉप्टर की तरह पंखों को घुमाने के लिए पांच खड़ी लाइन बनाई गई है। इसके साथ ही हेलिकॉप्टर की ब्लेड, रोटर और लैंडिंग के लिए स्टैंड को भी प्रदर्शित किया गया है। शैलचित्र में तश्तरीनुमा आठ के आकार के दो छेद भी बने हैं। इसी तरह गोटीगोला के पहाड़ों में एक पत्थर पर आठ शैलचित्र बने हैं। इनमें से दो शैलचित्रों पर जो कुछ अंकित है उसे यदि सिनेमा वाले एलियनों की कल्पनाओं के साथ मिला कर देखें तो वैसे ही दिखाई पड़ते हैं।
यह चर्चा इतनी व्यापक हुई कि कहा गया इसरो और नासा के वैज्ञानिकों को इन शैल चित्र की जानकारियाँ आगे के अध्ययन के लिये भेजी जायेंगी। जितनी तेजी से यह सबकुछ प्रसारित-प्रचारित हुआ उतनी ही तीव्रता से अनेक दावे एवं खण्डन भी प्रस्तुत किये गये। एक दावा यह कि कांकेर में अवस्थित लखनपुरी, गोटीटोला और पाराटोला में मिले इन चर्चित शैलचित्रों की खोज सेवानिवृत्त पुरातत्व वेत्ता डॉ. भारती श्रोती और डेक्कन कॉलेज, पुणे के सेवानिवृत्त प्रोफेसर जीएल बादाम ने वर्ष 2005 में की थी। इस सम्बन्ध में प्राप्त जानकारी से अनुसार डॉ. श्रोती और प्रो. बादाम ने एक राष्ट्रीय संगोष्ठी मे प्रस्तुत अपने शोधपत्र मे दावा किया था कि यह आकृति एलियन्स की न होकर शिरस्त्राण युक्त मानव की है, जो सामान्यत: शैलाश्रयों में पाए जाते हैं।



कांकेर के ही पत्रकार साथी कमल शुक्ला के साथ मैं भी चंदेरी और गोटाटोला की पहाडियों में इन शैलचित्रों को देखने पहुँचा। आसपास का वातावरण और परिवेश देख कर मन हरा हो गया। आदिमानव ने निवास के लिये जिन गुफाओं, पहाडियों का चयन किया वे आज भी उतनी ही सुरक्षित और अछूती हैं। हजारों वर्षों से उनकी निर्मितियाँ स्वत: संरक्षित हैं और आज भी चटकीली तथा सुस्पष्ट हैं। हमें प्रकृति का आभार मानना चाहिये कि उसने इन प्राचीनतम विरासतों तक पहुँचने के रास्तों को अत्यधिक दुर्गम बनाया है कि हर कोई आसानी से यहाँ तक न पहुँच सके। पुरातत्व विभाग के केवल दावे ही इन शैलचित्रों तक पहुँचे हैं किंतु न तो इन्हें घेरा गया है न ही इन्हें संरक्षित रखने की कोई और व्यवस्था की गयी है। अभी तो कथित एलियन की उडन तश्तरी सही सलामत है किसी नये जमाने के खुरापाती चित्रकार ने बदनियति से दो-चार लकीर और जोड दी तो कहीं उडन तश्तरी की मशीनरी और तकनीक पर बहस न खडी हो जाये।
मानव ने विकास के पुरापाषाणकालीन दौर मे गुफाओं मे रह कर अपने अनुभवों तथा कल्पनाओं का आरेखन पत्थरों पर किया। बस्तर मे न केवल कांकेर अपितु अनेक अन्य स्थान हैं जहाँ आखेट, मधुसंचय, नृत्य, पशुयुद्ध, अग्निपूजा, वनस्पति आदि से सम्बन्धित चित्र देखे गये हैं। दक्षिण बस्तर में नडपल्ली पहाडी के उपर चित्रित गुफा है जिसमे हिरणों की आकृतियाँ निर्मित हैं। मटनार गाँव के निकट मिले शैलचित्रों में अनेक पशु आकृतियाँ चित्रित हैं साथ ही किसी अलौकिक शक्ति की पूजा करने जैसी प्रतीति भी मिलती है इसी तरह फरसगाँव के शैलचित्रों में अनेक पक्षियों की आकृतियाँ बनी हुई हैं।
हमें एक छोटे बच्चे ने उस शैलचित्र तक का रास्ता दिखाया था जिसे एलियन की तशतरी मान लिया गया है। इस गुफा में अनेक शैलचित्र हैं तथा सभी अपने रूप-स्वरूप में भिन्न। यदि कल्पनाशीलता को हवा दी जाये तो निश्चित ही इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि हॉलीवुड फिल्मों की एलियन संकल्पनायें सच हैं। साथ ही उतना ही सच है कि आप पचासो एसी ही उलूल-जुलूल कल्पनायें और भी कर सकते हैं। यहाँ तो प्रभु मूरत देखी तिन तैसीवाला मुहावरा ही सटीक बैठता है। मेरा प्रश्न है कि पुरापाषाणकालीन मानव को किस हद तक समझा गया है? बस्तर में इन गुफाओं पर कितने शोध हुए हैं तथा उनपर पुरातत्व विभाग की क्या कोई स्पष्ट राय उपलब्ध है? उससे भी बडा प्रश्न मेरा यह है कि हम व्यस्त पीढी हैं और हमे बिल गेट्स की जीवनी पढने से फुर्सत नहीं है अत: इस पर अपनी विशेष बुद्धि न लगा कर इन विरसतों को आगे आने वाली पीढी के लिये बचाये रखने के लिये हम कुछ क्यों नहीं कर रहे?
इन गुफाओं में मैने जितना भी समय गुजारा अपनी कल्पना को भी खुला छोडे रखा था। मुझे सुखानुभूति हो रही थी कि दस हजार साल पहले के मानव और उसकी ऐसी कल्पनाशीलता से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ है जिसे हम आज भी समझने में असमर्थ हैं। यह पूरी घटना इतिहास को देखने के हमारी दृष्टिकोण की ओर भी इशारा करती है। हमने अपने अतीत को इतनी कल्पनाओं, संकल्पनाओं और असंभव दावों से पाट दिया है कि उसपर सच की रोशनी नहीं पहुँचती। पूर्वाग्रह और अपने ज्ञान को ले कर हमारे अहं इतने हैं कि अपनी कल्पना को ही आविष्कार मान कर अंगद का पाँव जमाये इतिहास पर खडे हैं। निश्चित ही कांकेर के शैलचित्र अबूझे हैं और इसका निष्कर्ष केवल इतना ही है कि आदिमानव के सभी क्रियाकलापों, गतिविधियों व कल्पनाशीलता को अभी पूरी तरह से समझना शेष है। ये शैलचित्र किसी एलियन के नहीं अपितु इतिहास को देखने की हमारी दृष्टि ही एलियन वाली है।



======= राजीव रंजन प्रसाद